आख़िरी लालटेन की रोशनी
उन सभी के लिए, जिन्होंने किसी अपने को खोकर भी मुस्कुराना सीखा।
केरल की मूसलाधार बारिश में नारियल के पेड़ों के बीच टंगे कागज़ के लालटेन धीरे-धीरे झूल रहे थे। रात के दो बजे अस्पताल की गश्त पूरी करके प्रिया बरामदे में खड़ी हुई, जहाँ गीली मिट्टी और भीगी सड़कों की सोंधी महक फैली थी। तभी उसकी जेब में रखा फोन बज उठा। स्क्रीन पर उसके छोटे भाई का नाम चमका—वही भाई, जिसने सालों से कभी पहले फोन नहीं किया था। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी थरथराहट थी, जैसे वह किसी छांव में छुपकर बोल रहा हो। उसने सिर्फ इतना कहा, "प्रिया, अगर तुम आ सकती हो, तो शहर आ जाओ। मैं उस बात को और नहीं छुपा सकता।" इससे पहले कि प्रिया कुछ पूछती, कॉल कट गया।
प्रिया ने अपनी नाइट-शिफ्ट किसी तरह संभाली और अगली बस पकड़कर कोच्चि के नियॉन रोशनी से नहाए शहर पहुँच गई। बारिश अब भी थमी नहीं थी। नियॉन विज्ञापनों की लाल-नीली रोशनी गीले डामर पर बहते पानी में तैर रही थी। स्टेशन के पास बनी इमारत की नौवीं मंजिल की एक अकेली खिड़की में पीली बत्ती जल रही थी—वही ठिकाना, जिसका ज़िक्र उसके भाई ने महीनों पहले एक बिखरी बातचीत में किया था। लिफ्ट की घरघराहट के बीच प्रिया का दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसे लगा कि वह किसी ऐसे सच के करीब पहुँच रही है, जिसे उसका भाई बरसों से अपने सीने में दबाए बैठा था।
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर कोई बड़ा हंगामा नहीं हुआ था, बस कुछ पुराने कागज़ात बिखरे थे और मेज़ पर एक आधा भरा चाय का कप ठंडा पड़ा था। खिड़की के पास खड़ा उसका भाई पलटा, उसकी आँखों में डर से ज़्यादा एक तरह की अजीब शांति थी। उसने प्रिया को एक भारी लिफ़ाफ़ा थमाते हुए कहा कि उसने वो सब सच पुलिस को भेज दिया है, जिसे छिपाने के लिए वे इतने साल अपनों से दूर भागते रहे। प्रिया समझ गई कि इस बार वह उसे किसी मुसीबत से बचा नहीं सकती। उसने हमेशा उसकी ढाल बनने की कोशिश की थी, लेकिन अब फैसला उसके हाथ से निकल चुका था।
वे दोनों चुपचाप भीगे हुए रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर आकर खड़े हो गए। रात की आख़िरी ट्रेन की सीटी दूर से गूंज रही थी और पटरियों पर जमा पानी में नियॉन लाइटें झिलमिला रही थीं। ट्रेन के रुकते ही भाई ने डिब्बे के पायदान पर पैर रखा और एक बार पीछे मुड़कर देखा। प्रिया ने अपना हाथ उठाया, लेकिन उसे रोका नहीं। जब लाल टेल-लाइट बारिश के धुंधलके में गायब हो गई, तो प्रिया ने महसूस किया कि कुछ रिश्तों को बचाए रखने के लिए उन्हें थामे रखना नहीं, बल्कि सही वक्त पर छोड़ देना ही सच्चा प्रेम है।
कुछ बंधनों को मुस्कुराकर अलविदा कहना ही उन्हें सही मायनों में निभाना होता है।